
माँ अल सुबह से तपती चूल्हे पर
बाप सूरज से लड़ता सड़क पर
घटते है खुद रोज तिल तिल कर
पुराने कपड़े धुल पहन तनकर
आधा पेट खाली गिरवी रखकर
जादू से हँसते नित आंसू पीकर
ले जाना जो है बच्चे बुलंदी पर
हर गम से दूर हो सुत सुता डगर
सलामत रहे सपने निजता घर
उम्मीद मुस्कान तेरी हो खुल कर












