
जब से रखा है अशोक जी ने मेरे जिन्दगी में कदम।
संवर संवर से गए है हम।
न कोई गिला है तब से किसी से।
बहुत दूर है हर गम हमारी जिंदगी से।
हर पल मन गुजरता है अपनों के बीच से।
न भटकना चाहे फिर वह और कहीं से।
मिलता है सुकून उसे अपने घर की चार दिवारी में।
खुशियों का बसेरा है मेरी इस नन्ही सी फुलवारी में।
सबके चेहरे पर मुस्कान देख देख दिल हर्षित होता है।
अपनों को दुःखी देख यह उदास होता है।
न मतलब है किसी दुनियादारी से।
गूंजता है मेरा घर नन्हों मुन्नों की किलकारी से।
बहुत सुना करते थे हम।
मूलधन से ब्याज प्यारा होता है।
अब तो यही एहसास हमारा है।
हर पल होठों पर अब यही दुआ रहती है।
न आंच आए कभी इस घर पर।
जिसके कोने कोने में धड़कन मेरी बसती है।
तभी तो मंजू की लेखनी आप सभी से यही कहती है।
मेरा घर ही मेरी दुनिया है।
जिसे देख देख सांसें मेरी चलती है।
अब तो उसी के बीच थमने की चाहत भी वह रखती है।।
मंजू अशोक राजाभोज
भंडारा (महाराष्ट्र)












