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आंखों की भाषा

लब हो जाते मौन जब,
आंखे सब कह देती हैं।
दिल की अनकही बातों को,
पल भर में कह देती हैं।

कभी चमकती हैं खुशी से,
कभी समेटे पीड़ा गहरी।
ग़म,खुशी हो या विरक्ति,
बिन बोले कह जाती हैं।

इनमें है सपनों का सागर,
इनमें यादों की परछाई।
इनमें छिपे हुए हैं किस्से,
इनमें कई अनकहे सवाल।

आँखों की अपनी भाषा है,
जो शब्दों से गहरी होती है।
अगर समझ में आ जाए तो,
दिल से दिल तक पहुंचती है।

डॉ.दीप्ति खरे,
मंडला(मध्य प्रदेश)

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