
अगर मौका मिला कभी, तो कागज पर,
अपनी थकान लिखूंगा।
मजबूत कंधों के पीछे छुपा,
वो छोटा सा इंसान लिखूंगा।
वो जो हर मुश्किल में मुस्कुरा कर कहता है,
“सब ठीक है”, उस एक झूठ के पीछे दबे हजारों बेबस तूफान लिखूंगा।
नहीं लिखूंगा मैं सिर्फ अपनी जीत के चर्चे दुनियां में,
मैं तो हार कर भी जो मुस्कुराए वो लहूलुहान स्वभिमान लिखूंगा।
लिखूंगा वो रातें, जब तकिया गवाह था मेरी सिसकियों का,
पर सुबह उठकर फिर से पहना, वो चट्टान जैसा इंसान लिखूंगा।
मैं लिख पाऊं कुछ तो, मैं खुद को लिखूंगा
अपनी रूह के हर जख्म को, अपना ही सम्मान लिखूंगा।
लिखूंगा उन सड़कों को भी, जो रोज़ मुझे चलाती हैं
मंज़िल नहीं देतीं, पर थमने नहीं देतीं।
लिखूंगा उन रिश्तों को, जो सिर्फ जरूरत में याद आए
और खुशी में भूल गए कि मैं भी कोई हूँ।
लिखूंगा उन खामोश दुआओं को माँ की
जो मेरे लिए रोकर भी “खुश रह बेटा” कहती हैं।
लिखूंगा उस पिता की थकी आँखों को
जो कभी थकना नहीं सीखे, बस सहते रहे।
नहीं चाहता दुनिया तालियाँ बजाए मेरे लिए
बस एक बार कोई पढ़े और बोले – “ये तो मेरी कहानी है।”
अगर एक भी दिल को सुकून दे गया मेरा दर्द
तो समझूंगा, लिखना बेकार नहीं गया।
और हाँ, अगर कभी खुद को हारता हुआ पाऊं
तो पन्ने पलट के खुद को याद दिलाऊंगा –
तू वही है जो टूट के भी खड़ा हुआ था
तू वही है जिसका नाम स्वाभिमान था।
अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)












