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सोच के उन मासूमों का,

सोच के उन मासूमों का, दिल विह्वल विह्वल हो जाता है,
बेजुबानों को रंजित रक्त से कैसे कोई देख पाता है !
धर्म तो ऐसा हो जिसमें कि दया अहिंसा करूणा हो,
धर्म वो कैसा शरणागत को मार के जो खा जाता है !!

कैसे सहन करेगी धरती निर्दोषों पर अत्याचार,
धर्म के नाम पर कब तक कटते रहेंगे ये पशु लाचार,
बलि ही देनी है तो खुदा को, अपनी बुराइयों की दे दो,
जिसने जीवन दिया उसी के नाम पे, ना दो किसी को मार !!

करते तुमसे अनुरोध हैं बंद हो अब ये कत्लेआम,
हाथ उठाकर दुआ करो बस, दो जीवों को अभय का दान
सारी धरती चहक उठेगी और महकता नभ होगा,
खुदा की रहमत बरस पड़ेगी बढ़ जाएगी धर्म की शान !!

जीव हिंसा किसी भी रूप में आपको सुख शांति और समृद्धि नहीं दे पाएगी, चाहे फिर ईद हो, दीपावली या होली !!
महावीर स्वामी के इस देश में केवल एक ही राष्ट्रनीति और सूत्र बने, “जियो और जीने दो” !!!

विरेन्द्र जैन “माहिर”
नागपुर महाराष्ट्र

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