
मैं शोर नहीं,
धीमे बहते जल सी हूँ,
जो हर दिल को छू जाए
वैसी सरल हलचल सी हूँ।
चेहरे पर ज्यादा रंग नहीं,
बस सच्चाई की आभा है,
मेरी नर्म सी मुस्कानों में
दिल की छोटी-सी भाषा है।
मैं ऊँची आवाज़ों वाली
दुनिया में भी शांत रही,
हर रिश्ते को प्रेम से सींचा,
फिर भी सबसे अनजान रही।
मेरी सादगी ही मेरा गहना,
नर्म स्वभाव ही पहचान है,
मैं कठोर शब्द नहीं कहती,
मुझमें बस थोड़ा-सा मान है।
ना किसी से आगे बढ़ने की
मुझको कोई होड़ रही,
मैं बस अपनेपन की मिट्टी में
खुशियों जैसी जोड़ रही।
जो मुझे समझ सके,
उसे मेरा दिल मिल जाएगा,
मेरी खामोशी का हर किस्सा
धीरे-धीरे खिल जाएगा।
मैं वैसी ही अच्छी हूँ,
जैसी रब ने मुझको बनाया है,
सादगी के इस छोटे दीप ने
हर अँधियारा मिटाया है।
नेहा कुमारी (खुशी)
शोधार्थी
अखनूर जम्मू कश्मीर












