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मेरे अंतर्द्वंद्व

कभी-कभी मन करता है
छोड़ दूँ सारी दुनियादारी,
निकल जाऊँ किसी
ऐसी अनन्त यात्रा पर—
जहाँ कोई न हो,
न अपना, न पराया।
हो बस अनन्त शून्य,
और होऊँ मैं—बस।
इतने में आ जाता है ख्याल
ख़ुदग़र्ज़ होने का,
जो धिक्कार देता है
मुझे मेरे ही विचारों के लिए।
और दिला देता है मुझे
मेरा कर्तव्यबोध कि—
जिन्होंने ख़ुद नहीं जिए
अपने जीवन, तुम्हारे लिए,
उनके प्रति इतनी कृतघ्नता क्यों?
क्या गलती है उनकी?
यही कि तुम्हारे सपनों के लिए
उन्होंने ख़ुद की कुर्बानी दी—
यही न?

फिर लौट आती हूँ
अपनी उसी पुरानी दुनिया में,
उठा लेती हूँ कभी फोन,
तो कभी किताबें,
और कभी-कभी
ख़ुद पर प्रश्न।।।
अन्जू अवस्थी (श्रावस्ती)

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