
अब दो आत्माएं
न रही जन्म-जन्म के बंधन ।
अब दो जीवों की भावनाऐं
एक दूजे को लिए बस
ये इच्छाओं का स्पंदन।
ये कलिकाल है-धर्म नहीं निभे
मन की व्याकुलता में घिरे
संसर्ग ही रहा शेष
गंधर्व-मिलन
इच्छाओं के वशीभूत है मानव
शेष रह गया जीवन में क्रंदन ।
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महेश शर्मा, करनाल













