
दो आत्मा का पावन बंधन,
जब बांधे भाग्य विधाता है।
नारी सहधर्मिणी बन कर,
जोड़ती नर संग नाता है।।
जीवन भर साथ निभाने का,
संकल्प ब्याह दे जाता है।
सप्तपदी के साथ फेर ले,
जीते जैसे युगों से नाता है।।
अग्नि को साक्षी मान के दो,
मन मीत मिलन जब होता है।
वेद मंत्र, आशीष बड़ों का,
पुण्य बीज फल बोता है।।
गृहस्थ जीवन का दीप जला,
प्यारी बगिया सी सजती है।
धर्म आचरण प्रेम त्याग की,
नींव विवाह संग पड़ती है।।
विश्वास प्रेम के धागे से,
दो कुल गौरव जुड़ जाते हैं।
मंगलसूत्र के सूत्र में बंध,
सनातनी रीति निभाते हैं।।
भगवान दास शर्मा “प्रशांत”
इटावा उत्तर प्रदेश













