
बरखा बहार आई कैसी मुसलसल ये झडी लगाई
आती तसब्वुर में वो यादें मन रुआंसा कर देती हैं
काले बादल नभ पर छाये कैसे मन काबू रह पाये
जिनके संगी साथी संग में मन प्रेम की जोत जगाये
सावन की यह पहली फुहार हम भीगे थे पहली बार
मूसलाधार बारिश में हम छत पर भीगे थे उस बार
यौवन था चाहत भरा खजाना था ये मन बेकाबू था
तन और मन बारिश के पानी में भीगे थे पहली बार
उस दिन भी बिजली कौंधी हम डरके सिमट गए थे
सर्दी जुकाम से बचने को गरमा गरम पकोडे तले थै
एकाकी यह जीवन बरसता सावन आग लगाता है
उस दिन का सीन सोचता हूं चेहरा भूल जाता हूं।
-गोवर्धन थपलियाल













