Uncategorized
Trending

गजल

तुम फिर आ गई मेरी शायरी में… क्या करूँ,
न मुझसे शायरी दूर जाती है, न शायरी से तुम।
हर ग़ज़ल की रदीफ़ में तुम्हारा ही ज़िक्र रहता है,
हर नज़्म की ख़ामोशी में तुम्हारा ही असर रहता है।
लफ़्ज़ बदल जाते हैं, मौसम भी गुज़र जाते हैं,
मगर कुछ नाम ऐसे होते हैं
जो हर क़लम की स्याही में बस जाते हैं।
तुन्हें भुलाने की हर कोशिश, एक नई ग़ज़ल बन गई,
जितना मिटाना चाहा तुम्हें, उतनी ही मुकम्मल शायरी बन गई।

धर्मेंद्र कुमार राठौर
व्याख्याता भौतिकविज्ञान
झालावाड़ राजस्थान

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *