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एक और शाम……बिहार काव्य गोष्ठी की समीक्षा जौनपुर से

आज की काव्य संध्या की विशेषता यह रही कि मंच की अन्य इकाइयों की तरह कविताएं मात्र बरसात और मेघो की व्यंजना तक सीमित न रहीं, वरन् मानवीय विमर्श के अन्य आयामों को भी उन्होंने स्पर्श किया।
लेकिन ऐसी दो रचनाओं से पहले चर्चा सत्यभामा सिंह की। आप की संगठन क्षमता के प्रसाद के रूप में फलता फूलता लहराता बी एम एस टी मंच आपकी कविताओं जैसा ही खूबसूरत होता जा रहा है।
आपका आज का भाव पूर्ण चित्त्रत्मक गीत मौसम के अनुकूल भी था और संदेश प्रधान भी।
गीत का मुखड़ा-
“पावस की बूंदे, जीवन का वरदान,
सूखी धरती हर्षित हो कर गाती नव अभियान”
यहां वरदान”और”नव अभियान”शब्द डिकोड करने पर, इनके भाव दीर्घ विस्तार पाते हैं।
अगली कड़ी का भाव- मेघ घिरता है तो हरियाली की उम्मीद उल्लास का संचार करती है।
अगली कड़ी का भाव है कि नदी ताल भरते हैं तो जीव जगत प्रसन्नता से भर उठता है, किसान मोर दादुर का हर्ष अवर्णनीय हो उठता है।
अगली कड़ी मोर का नृत्य, दादुर की तान में प्रेम की पुकार होती है। यह प्रेम की ऋतु है।
और अंतिम कड़ी जल संचय का आवाहन करती है।
इस प्रकार यह गीत वर्षा को हर रंग में देखता है और भावुक अपील भी करता है।
मुख्य अतिथि पूर्णिमा सुमन , अध्यक्ष बिहार इकाई ,ने यद्यपि कवयित्री होने से इंकार किया किन्तु जो अनगढ़ कविता उन्होंने पढ़ी उसके भाव इतने सुघड़ थे कि सब वाह वाह कह उठे और एक बात प्रमाणित हो गई कि भाव हो तो छंद विधान या व्याकरण के बिना भी वे संप्रेषित हो जाते है और अपना छंद वे स्वयं बुन लेते हैं। पूर्णिमा जी की अभिव्यक्ति एक सफल कविता थी, उनके इनकार के बावजूद।
उनकी कविता ने सहकार, प्रेम, सहयोग, सहायता, भ्रातृ भाव का संदेश देते हुए, निवेदन कि हम एक दूसरे के घावों पर मलहम लगाएं, करुणा से पीर बांटे, डूबते को किनारा दें, नारियों को उत्थान का अवसर दे कर संस्कृति का उत्थान करें और संगठित रहें।
संचालिका खुशबू बर्नवाल ने गंगा नगर में बच्ची के प्रति आसुरी व्यवहार से व्यथित हो कर अपनी आक्रोश से भरी कविता में, एक बच्ची के भाव व्यक्त करते हुए, पिता से आग्रह किया किमुझे आत्मनिर्णय करने और स्वभाव से सुकोमल होते हुए भी, निर्णय में कठोर होने का संस्कार दीजिए । मुझे, पिता, देह मन से कठोर बनाइए। और मां तुम जन्मदात्री हो तो थोड़ा संस्कार बेटो कोभी दो, उन्हें भी आचरण की सीमा समझाओ।
अंत में कामेश्वर कुमार”कामेश”ने सावन पर मुक्तक और बरसात पर एक गीत सुना कर गोष्ठी का समापन किया।

-sbupadhyay

   

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