
एक छोटा सा घर हमने भी ख्वाबों मे खूब संजोया था
अपनों के बीच अपनों की ही दुनियाँ मे खोया था
दो कमरों के मकान मे दस अपनों का साथ था
एक रोटी चार हिस्सों मे बाँटने का सुंदर सा रिवाज था
तीज त्यौहार पर कोलाहल सजावट का हिस्सा हुआ करता था
मिलजुल कर त्यौहार के सभी तैयारियों का बंटवारा हुआ करता था
छोटे बड़े सभी मे एक मर्यादा का मान होता था
चाचा चाची ताऊ ताई सभी का दर्जा माँ बाप समान होता था
बुजुर्गों की डाँट आशीर्वाद और प्रेम का एक मीठा अहसास था
उनका मार्ग दर्शन ही परछाई की तरह छोटों का साथ था
भौतिकता की आँधी मे घर अब दस कमरों के हो गये
स्वार्थ के वशीभूत घर के सदस्य मात्र दो रह गये
ख्वाबों का घर ख्वाब मे ही ढह गया
घर तो बड़ा था दिल सबका छोटा रह गया
मेरा तेरा के फेर मे परिवार बिखर गये
ख्वाबों के घर अब ख्वाब ही रह गये
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र













