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चेतक वाला रंगेला

खाटू श्याम की सोंधी खुशबू साँसों में भर लाया हूँ,
और तुम्हें हँसाने के खातिर मैं बड़ी दूर से आया हूँ।
डबल तालियाँ मेरे लिए तुम बस इसी बात पर दे देना,
मैं सावनेर नागपुर से अमन रंगेला चेतक पर बैठ कर आया हूँ।

संतरे की नगरी से लाया हूँ मैं मीठी सी मुस्कान,
और खाटू वाले बाबा का मुझको मिला वरदान।
हँसी के ठहाके लगवाऊँगा, महफ़िल को सजाऊँगा,
तेरे चेहरे की उदासी को आज मैं उड़ाऊँगा।

रास्ते में मिले जो ग़म सबको ठोकर मार आया हूँ,
खुशियों की पोटली लेकर मैं तेरे द्वार आया हूँ।
ना घोड़ा है ना रथ है, बस जज़्बात की सवारी है,
ये अमन रंगेला हाज़िर है, यही मेरी तैयारी है।

ना मैं नेता हूँ ना अभिनेता, मैं तो ठहरा कवि रंगेला,
मेरी बातों में ना कोई नकली, ना कोई दिखावे वाला खेला।
जेब में रखा है एक पुर्जा, उसमें लिखा है प्यार का नुस्खा,
बाँट रहा हूँ सबको मुफ्त में, ना कोई पैसा ना कोई चुस्खा।

चेतक की टापों से मैंने धूल उड़ाई थी रास्तों की,
हर मोड़ पे किस्से बटोरे, हर गाँव में कहानी बस्ती की।
किसी ने चाय पिलाई रस्ते में, किसी ने पूछा हालचाल,
मैंने कहा बस एक दुआ दे दो, महफ़िल में हो मेरा कमाल।

ये माइक पकड़ा है तो अब छोड़ूँगा नहीं इतनी जल्दी,
तेरी हँसी की गूँज सुने बिन, जाऊँगा नहीं घर लौट के।
नागपुर का संतरा हूँ मैं, थोड़ा खट्टा थोड़ा मीठा,
पर जो भी चख ले एक बार, कहे वाह रंगेला जीता।

अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)

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