Uncategorized
Trending

अंतिम रास्ता

रमेश आज फिर वृद्धाश्रम के उसी कोने में बैठा था, जहाँ से सड़क साफ़ दिखाई देती थी। उसकी आँखें हर आती-जाती गाड़ी पर ठहर जातीं। उसे उम्मीद थी कि शायद आज उसका बेटा उसे लेने आएगा।

पाँच वर्ष पहले बेटे ने उसे यह कहकर वृद्धाश्रम में छोड़ दिया था कि “कुछ दिनों की बात है, पिताजी। नौकरी और बच्चों की जिम्मेदारियाँ संभल जाएँ, फिर आपको अपने साथ ले जाऊँगा।”

लेकिन वे “कुछ दिन” पाँच साल में बदल गए।
रमेश के कमरे में एक पुराना बक्सा था, जिसमें बेटे के बचपन की तस्वीरें, स्कूल की मार्कशीट और उसकी पहली कमाई से खरीदा गया रुमाल रखा था। जब भी मन उदास होता, वह बक्सा खोलकर बैठ जाता और बीते दिनों को जीने लगता।

एक सुबह उसकी तबीयत अचानक बिगड़ गई। वृद्धाश्रम के संचालक ने बेटे को फोन किया। बेटे ने कहा, “मैं पहुँचने की कोशिश करता हूँ।”

शाम तक रमेश की साँसें धीमी होने लगीं। उसने संचालक का हाथ पकड़कर कहा, “अगर मेरा बेटा आए तो उससे कहना, मैं उससे कभी नाराज़ नहीं था।”

रात गहराने लगी। दरवाज़े पर किसी के तेज़ कदमों की आवाज़ आई। बेटा दौड़ता हुआ कमरे में पहुँचा।

“पिताजी…!” उसकी आवाज़ काँप रही थी।

रमेश ने बड़ी मुश्किल से आँखें खोलीं। सामने बेटे को देखकर उनके चेहरे पर संतोष की हल्की मुस्कान फैल गई।

“आ गए बेटा…” बस इतना ही कह पाए।
बेटे ने उनका हाथ अपने माथे से लगा लिया। आँसू रुक नहीं रहे थे।
“मुझे माफ़ कर दीजिए पिताजी… मैं आपकी कीमत बहुत देर से समझ पाया।”

रमेश ने बेटे के सिर पर हाथ रखा और धीमे स्वर में बोले, “बेटा, माता-पिता बच्चों को सज़ा नहीं देते… बस उनका इंतज़ार करते हैं।”

अगले ही पल उनका हाथ ढीला पड़ गया।
बेटा फूट-फूटकर रो पड़ा। आज उसे समझ आया था कि जीवन का अंतिम रास्ता हर व्यक्ति को अकेले तय करना पड़ता है, लेकिन उस रास्ते तक पहुँचने से पहले अपनों का साथ और प्रेम ही सबसे बड़ी दौलत होता है।

डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *