
जल ही जीवन है फिर भविष्य क्यों प्यासा है
जरूरत इंसान की सीमित है फिर ज्यादा की क्यों अभिलाषा है
दिन रात की प्रतिस्पर्धा मे जीवन कहीं खो सा गया है
मशीनी युग मे इंसान भी मशीनी क्यों हो गया है
खाली हाथ आये हो जाना भी सब यहाँ छूट जाना है
पेट से बढ़कर फिर किसके लिए जुटाना है
जान है जीवन है खूबसूरती इसका लिबास है
मिथ्या अभिलाषा मे हे मूर्ख क्या तेरी तलाश है
भौतिक सुखों की अनचाही चाहत मे इंसान चलता फिरता कलपुरज़ा हो गया
जीवन सँवारने की छदम लालसा मे बेईमानी का जीता जागता नवाब हो गया
दो रोटी की भूख और दो बूंद की प्यास है
जीने की वजह है किसकी और तुझे तलाश है
ईश्वर की देन ये नश्वर संसार है नश्वर ये काया है
जाना तेरा नियत है जहाँ से तू आया है
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र













