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चिंतन प्रसंग

तथाकथित नकली साधुओं एवं असंयमित कथावाचकों ने साधु एवं कथावाचकों के वेष को बदनाम करने का काम किया है। अब हमें माथे पर चंदन और गले में मालाएं पहनने में भी शर्म आती है। कहीं लोग हमें उसी गिरोह का व्यक्ति न समझ लें। जब तक स्त्री और धन के प्रति सच्चा वैराग्य जीवन में न आ जाए, तब तक संन्यासी या साधु नहीं बनना चाहिए। पूज्य महाराज श्री रामकिंकर जी अपने प्रवचनों में कहा करते थे कि किसी ने तुलसीदास जी से पूछा कि हम संन्यास ले ले क्या, तो गोस्वामी जी ने कहा -बिल्कुल मत लो। एक दृष्टांत के द्वारा विनय-पत्रिका में गोस्वामी जी ने समझाया कि जैसे कच्चे घड़े से कुएं का पानी निकालने पर वह घड़ा पानी नहीं निकाल सकता। बल्कि पानी में घुलकर पानी को ही गंदा करेगा। इसी प्रकार जब तक जीवन में वैराग्य न आ जाए तब तक साधु या संन्यासी नहीं बनना चाहिए।
” बिगरत मन संन्यास लेत जल नावत आम घरो सो “
जब तक घड़ा पका न हो तब तक वह पानी भरने लायक नहीं होता। जब वही घड़ा अग्नि से अच्छी तरह पक जाता है, तब वह शीतल जल हमें देता है। इसी प्रकार हमारा मन जब तक वैराग्य की अग्नि से पक न जाए ,तब तक गृहस्थ में ही रहकर भगवान की भक्ति करनी चाहिए। साधु बनकर भी जब धन और स्त्री के पीछे भागते हुए ही जीवन बीत रहा है, तो ऐसा साधु को न लोक में सम्मान मिलेगा और न परलोक सुधरेगा।

पंडित आदित्य प्रकाश त्रिपाठी
श्री राम कथा श्रीमद् भागवत शिव पुराण के सरस एवं तात्विक प्रवक्ता

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