
कुछ मिलता है ,कुछ खोता है,क्रम अनवरत चलता है।
धूप-छाँव की आँख-मिचौली बन जीवन ये चलता है।
पतझड़ आता जब उपवन में
पत्ते सारे झड़ जाते हैं।
पर्ण विहीन खड़े तरूवर, किंचित न अकुलाते हैं।
हर खिजां के बाद चमन में,मौसम मधुमास का आता है।
बिखरा है जो फिर संवरेगा, मन में आस जगाता है।
लाखों बार किश्तियां डूबी,सागर की मौजों में फंसकर,
उत्ताल तरंगों ने तट पर, कोहराम मचाया जी भर-भर कर।
पर विषाद की रेखा का, सागर न लेखा रखता है,
परिवर्तन नियति का उपहार, गान ये हरदम करता है।
रात चाँदनी कुछ इतराती, पहन लेती सुबहा की धोती।
गहन तम के भाल पर हँसकर , रवि लगा देता है रोरी।
वस्त्र बदल लेता है तन भी , नये स्वरूप में ढल जाता है
खो जाते हैं चंद खिलौने, कहीं सुरभित कँवल खिला करता है।
तम की उम्र न होती लंबी,सूरज सबको हरषाता है।
सपना कोई टूट जाये, दर्पण न घबराता है।।
——–मंजू शकुन खरे—–













