
रुमाल ले लिया है किसी माह जबीन से,
कब तक पसीना पोछते हम आस्तीन से।
यें आंसुओ के दाग़ है आंसू ही धोयेंगे,
यें दाग़ धुल न पाएंगे वशिंग मशीन से।
इश्क़ के ज़ख़्म कपड़ों पे लगते कहाँ,
ये तो रूह पर निशान बने हैं हसीन से।
दिल की अलमारी में रखे हैं जो दर्द
वो निकल न पाएँगे किसी ड्राई क्लीन से।
लोग कहते हैं भूल जा, आगे बढ़ जा,
पर यादों के छींटे छूटें कैसे ज़मीं से।
जो नाम लिखा है साँसों की सिलवट पर
वो मिट न पाएगा किसी भी तहज़ीब से।
तेरे रुमाल की खुशबू में जी लेते हैं,
ज़िंदगी क्या गुज़ारेंगे अब यकीन से।
मोहब्बत की ये धुलाई सबसे अलग है,
दिल का मैल छूटता है सिर्फ़ आँसू के साबुन से।
चाँद से चेहरा धोया तो दाग़ बढ़ गए,
अब तो डर लगता है आईने से, जबीन से।
‘ अमन’ लिखता है दर्द को हँस के कागज़ पर,
वरना कब के मर जाते हम इस ग़मगीन से।
अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)













