
कैसे कर लेते हो तुम ये सब,
अपूर्ण को भी पूर्ण कर देते हो।
एक पूर्ण अस्तित्व हो पापा,
घर की हर नींव तुमसे है।
तेरे बिना कहाँ फूटती है
जीवन की पहली कोंपल?
धरा से अंबर तक फैली है,
पापा, तेरी स्नेहमयी छाया।
कहने को तो संसार माँ को
ममता की प्रतिमूर्ति कहता है,
किन्तु माँ भी तभी माँ बन पाती है,
जब तेरे श्रम का दीपक जलता है।
वटवृक्ष-सी शीतल छाया हो तुम,
तेरे साए में नवजीवन पलता है।
दुनिया ने माँ को सब कुछ कहा,
पर तेरा त्याग कहाँ दिखता है।
फिर भी त्याग की हर गाथा में
तेरा नाम नहीं आता है,
तुमसे ही जीवन आरम्भ होता,
तुमसे ही अस्तित्व पाता है।
तुम उस जड़ के समान हो
जो धरती से जुड़ी रहती है,
जिसके बल पर सम्पूर्ण वृक्ष
अडिग और अटल खड़ा रहता है।
मेरे पास इतने शब्द नहीं
जो तेरे त्याग को कह पाएँ,
तेरे श्रम, बलिदान और कर्म का
पूर्ण अर्थ समझा पाएँ।
बस एक छोटा-सा प्रयास है,
तुझे तेरा सम्मान दिलाने का।
जो अक्सर अनदेखा रह जाता,
उस सत्य को जग में लाने का।
एक पूर्ण अस्तित्व हो पापा,
माँ यदि घर का हृदय है,
तो पिता उसकी आत्मा हैं।
तुमसे ही घर, तुमसे ही संसार,
तुमसे ही मेरे जीवन का सारा विस्तार है।॥
रंजीता भारती श्री
सीतामढ़ी, बिहार













