
निर्दोषों का बस यहां,रोज हो रहा खून।
अंधा बहरा हो गया,लगता अब कानून।।
दोषी निधड़क घूमते, पुलिस प्रशासन मौन।
पीड़ित मानव की यहाँ,पीर सुनेगा कौन?।।
नित जनता दरबार में,लगती भीड़ अपार।
पर हो पाता है नहीं, झगड़ों का निस्तार।।
अधिकारी सुनते नहीं,बिन पैसे के बात।
नेता देते झूठ की, लोगों को सौगात।।
नेता करते मौज हैं,भूखा मरे किसान।
कहते भारत देश में,सब हैं एक समान।।
रक्षक भक्षक अब बन गए,लाज बचाए कौन।
लुटे लाज जब नारि की,हो जाते सब मौन।।
खेल रही सरकार भी, जातिवाद का खेल।
पुलिस प्रशासन जेल में,दीन रही नित ठेल।।
अगर ग़लत कानून का ,करता दीन विरोध।
वर्दी लेती है तुरत,उस नर से प्रतिशोध।।
कोई सुनता है नहीं,कभी दीन की बात।
सभी देखते हैं महज, निर्धन की औकात।।
पैसे से बढ़कर नहीं, निर्धन की है जान।
पैसे वाले को यहां,मिलता बस सम्मान।।
जीना है इस देश में,रहो सिर्फ चुपचाप।
नहीं भरत की तरह ही,मर जाओगे आप।।
सच भी कहना हो गया,अब तो यहाँ गुनाह।
दोषी को इस देश में,मिलती सिर्फ पनाह।।
देख ग़लत को चुप रहो,बोलो सत्य न बोल।
नेता के चमचे नहीं, देंगे सिर को खोल।।
भूले से सरकार का,करना नहीं विरोध।
नहीं करेंगे वैद्य बस , मृत शरीर पे शोध।।
जैसी भी सरकार है,करो सिर्फ गुणगान।
बची रहेगी देह में,तभी आपके जान।।
राम जी तिवारी”राम”
उन्नाव (उत्तर प्रदेश)













