
प्रेम की सरहद जहाँ ख़ामोश हो जाती है,
वहीं राधा की दृष्टि कृष्ण बन जाती है।
न मिलन की खुशी, न विरह का कोई शोर,
यह साधना है जहाँ आत्मा झुक जाती है।
राधा नाम नहीं, एक शुद्ध अनुभूति है,
कृष्ण में जाकर हर पहचान मिट जाती है।
न कोई वचन, न बंधन, न लोक-लाज यहाँ,
जहाँ भक्ति ही एकमात्र जाति बन जाती है।
कृष्ण रुकते नहीं, राधा बुलाती नहीं,
फिर भी हर राह वहीं आकर सिमट जाती है।
प्रेम के पार जो पहुँचा, समझ पाया यह,
वहाँ ईश्वर से पहले इंसानियत जग जाती है।
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र













