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कविता

जेठ की तपती दोपहरी में,
जब धधक उठता है आकाश,
सूख जाते हैं कंठ सभी के,
और थम जाती मन की प्यास।

ऐसे कठिन समय में भी जब,
भक्ति का दीप जलता है,
निर्जला एकादशी का व्रत,
श्रद्धा का पर्व बनता है।

न जल की बूंद, न अन्न का दाना,
फिर भी मन मुस्काता है,
हरि चरणों में अटूट समर्पण,
जीवन को महकाता है।

यह केवल उपवास नहीं है,
आत्मा का उत्सव होता है,
जब अहंकार झुक जाता है,
और विश्वास प्रबल होता है।

सूखे अधरों की हर दरार में,
हरि-नाम का अमृत बहता है,
थके हुए इस जीवन को फिर,
भक्ति का संबल मिलता है।

माँ की ममता, पिता की आशा,
संतों का पावन उपदेश,
सब मिलकर कहते हैं हमसे—
प्रेम ही जीवन का संदेश।

निर्जला एकादशी सिखलाती,
त्याग कभी व्यर्थ नहीं जाता,
जो प्रभु पर विश्वास रखे,
उसका जीवन सफल हो जाता।

डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र

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