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मैं दिव्यांग हूं

हां मैं मानता हूं कि दिव्यांग हूं
मगर तन से हूं मन से नहीं
मेरे हौंसले हैं बुलन्द
मैं नहीं किसी से कम
मेरे भी कुछ अरमान हैं
कुछ काम को करने की चाहत है
चाहे हो कोई काम करने को मैं हूं आतुर
सुबह सवेरे जाग कर सब्जी -भाजी
बेचने निकले जाता हूं
माता-पिता और बहना का भी पेट भरने का जुगाड़ कर लेता हूं
कई बार मुझे भी मिले हैं मेडल और सम्मान करो ना कभी मेरा अपमान
मेरा हंसी उड़ाने वालों कभी तुम्हारे साथ भी ऐसा हो सकता है
मैं अपनी मेहनत और लगन से
देख लेना जरूरी एक दिन
घर -परिवार के संग देश का नाम रौशन करूंगा
जी हां , मैं दिव्यांग हूं अपने मन की सुनता हूं
मैं जीवन के इस सफर में निरन्तर कामयाबी हासिल करूंगा

डॉ मीना कुमारी परिहार

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