
सिर्फ़ “नशा मुक्ति दिवस” लिखे एक पोस्टर की तरह,
मैं उन चीखों का दस्तावेज़ हूँ
जो कभी अख़बारों में नहीं छपतीं।
मैंने देखा है—
एक बेटे को अपनी ही माँ की चूड़ियाँ बिकवाते,
एक पिता को अपनी ही नज़रों से गिरते,
और एक मासूम बचपन को
रोटी से पहले आँसू गिनते।
नशा कभी अकेला नहीं आता,
अपने साथ लाता है—
विश्वास की मौत,
रिश्तों का जनाज़ा,
और सपनों की चिता।
इस हथेली की पाँच उँगलियाँ
आज पाँच प्रश्न पूछ रही हैं—
क्या एक नशा
तुम्हारी माँ की मुस्कान से बड़ा है?
क्या एक कश
तुम्हारे पिता के संघर्ष से भारी है?
क्या एक बोतल
तुम्हारे बच्चों के भविष्य से कीमती है?
क्या एक पल का नशा
पूरी उम्र की खुशियाँ खरीद सकता है?
और सबसे बड़ा प्रश्न—
जब जीवन ही सबसे सुंदर नशा है,
तो फिर मौत का सौदा क्यों?
आओ…
आज किसी नशे को नहीं,
किसी टूटे हुए इंसान का हाथ थामें।
क्योंकि नशा छोड़ने वाला केवल एक व्यक्ति नहीं बचता,
उसके साथ पूरा परिवार फिर से जी उठता है।
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र













