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विश्व हिन्दी परिषद की अंतरराष्ट्रीय काव्य गोष्ठी में गूँजी हिंदी, नारी शक्ति और विश्व शांति की स्वर-लहरियाँ

भगवान दास शर्मा “प्रशांत”
संवाददाता नई दिल्ली

विश्व हिन्दी परिषद के तत्वावधान में 27 जून 2026, शनिवार को रात्रि 8 बजे (भारतीय समयानुसार) आभासी मंच पर भव्य अंतरराष्ट्रीय काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। भारत सहित अमेरिका, कनाडा, नीदरलैंड, चीन, जापान, ऑस्ट्रेलिया, कतर आदि देशों के साहित्य साधकों ने सक्रिय सहभागिता कर आयोजन को ऐतिहासिक बना दिया। हिन्दी भाषा का वैश्विक स्वरूप, पर्यावरण संरक्षण, नारी शक्ति – स्वाभिमान एवं सम्मान तथा विश्व शांति जैसे विषयों पर कवियों ने अपनी उत्कृष्ट एवं मार्मिक रचनाएँ प्रस्तुत कीं। कार्यक्रम का शुभारंभ अमेरिका से जुड़ीं श्रीमती कादम्बरी शंकर ‘आदेश’ की मधुर सरस्वती वंदना से हुआ। उन्होंने माँ के विविध रूपों के महत्व को रेखांकित करती रचना सुनाई। नीदरलैंड से डॉ. ऋतु ‘ननन’ पांडे ने पिता के संघर्षों और बलिदानों को शब्द देते हुए श्रोताओं को भावुक कर दिया। कनाडा से जुड़ीं डॉ. स्नेहा ठाकुर ने नारी शक्ति पर सशक्त उद्घोष किया – “नारी हूँ, पुरुष और पुरुषार्थ को जन्म देती हूँ।” चीन से डॉ. विवेक मणि त्रिपाठी ने नारी की तुलना समुद्र की लहरों से करते हुए कहा, “नारी भी इसी तरह न रुकती है, न रुकने देती है।अनवरत प्रवाहित होती रहती है।” प्रख्यात साहित्यकार श्री मृदुल कीर्ति ने ‘नारी और धरती’ का तुलनात्मक चित्रण करते हुए कहा -“धरती के सदृश रत्नगर्भा है नारी, हर युग में न जाने कितने महापुरुषों को जन्म दिया है। अंतस के तरल सूर्य से बहते लावे को सहती है, फिर भी सुकोमलता का संचार करती है।”
इंदौर से डॉ. अशोक भार्गव ने ‘मेरी अलौकिक भाषा हिन्दी’ शीर्षक से कविता सुनाई –
“हिन्दी के अश्वमेध का घोड़ा दौड़ रहा है, जो थे आगे उन्हें पीछे छोड़ रहा है।”_ उन्होंने विश्वास जताया कि विश्व में तीसरे स्थान पर काबिज हिन्दी शीघ्र ही प्रथम स्थान पर होगी। अमेरिका से विश्व हिन्दी परिषद की मनोनीत अध्यक्ष डॉ. दुर्गा सिन्हा ‘उदार’ ने विश्व शांति विषय पर कहा कि आत्ममंथन व आत्मचिंतन जरूरी है। उन्होंने कविता सुनाई – “चलो खुद से बातें करें आज जी भर, ये युद्ध और आतंक जीवन से दूर होना चाहिए। शस्त्र नहीं, शास्त्र की जरूरत है। नेह-प्रेम, भाईचारे की जरूरत है।” नागपुर से श्री कृष्ण कुमार द्विवेदी ने आशा जगाई – “मिलेगी मंज़िल मगर धीरे-धीरे।” इटावा उत्तर प्रदेश से श्री भगवान दास शर्मा “प्रशांत” ने अपनी प्रस्तुति में हिन्दी भाषा का महत्व और वीर नारियों को समर्पित रचना पढ़ी। समयाभाव के कारण अन्य रचनाकारों में उड़ीसा से डॉक्टर मनीष कुमार पांडेय, कुवैत से डॉ आरती परिख, महाराष्ट्र से डॉ बालकृष्ण महाजन, पश्चिमी चंपारण से शिप्रा मिश्रा, पश्चिम बंगाल से श्वेता गुप्ता ‘श्वेतांबरी’, छत्तीसगढ़ से डॉ. संगीता सिंह ‘बनाफर’, गुवाहाटी से विनय कुमार ‘बुद्ध’, मधुबनी से विजय कुमार यादव, उड़ीसा से विक्रमादित्य सिंह, हरियाणा से दिलबाग सिंह ‘अकेला’, उत्तराखंड से अर्चना त्यागी, हिसार से डॉ कासम खान और महाराष्ट्र से पुरुषोत्तम कुंडे ने सारगर्भित ढंग से अपनी बात रखी।
अध्यक्षता कर रहे विश्व हिन्दी परिषद के राष्ट्रीय महासचिव डॉ. विपिन कुमार ने सभी की अभिव्यक्ति की सराहना की। उन्होंने आगामी आयोजनों की जानकारी दी और विश्व में बच्चों को हिन्दी सीखने के लिए प्रेरित करने पर बल दिया। राष्ट्रीय संपर्क समन्वयक डॉ. नन्दकिशोर साह के कुशल संचालन में दो घंटे से अधिक समय तक कार्यक्रम पूरे जोशो-खरोश से चला। उन्होंने अधिकांश प्रतिभागियों को अपनी बात रखने का अवसर दिया। अंत में विधिवत समापन की घोषणा की गई।

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