
क्रांति धारा रुकती कब है,
यह पर्वत से टकराती है,
अन्यायों की हर दीवारों को,
क्षण भर में धूल बनाती है।
क्रांति केवल रण का घोष नहीं,
यह जन-मन की जागृति है,
जब सोई हुई चेतना जागे,
वही सच्ची स्वतंत्रता की वृत्ति है।
जहाँ विवेक का दीप जले,
वहीं क्रांति का जन्म हुआ,
जिसने भय से समझौता छोड़ा,
वहीं नया इतिहास हुआ।
कलम अगर सच लिखने निकले,
वह भी एक तलवार बने,
शब्दों की हर अग्नि-शिखा से,
नवयुग का विस्तार बने।
युवा! तुम्हारी मुट्ठी में ही
कल का उज्ज्वल सूरज है,
तुम चल पड़ो तो हर अँधियारा
क्षण भर का ही मेहमान है।
क्रांति धारा रक्त नहीं,
चरित्रों का निर्माण बने।
घृणा नहीं, संकल्प जले,
भारत का उत्थान बने।
आओ, ऐसी क्रांति लाएँ,
जिसमें सत्य का मान रहे,
हर हृदय में राष्ट्र बसे,
हर जीवन में स्वाभिमान रहे।
जब तक अन्याय शेष रहेगा,
संघर्षों का आह्वान रहेगा ,
क्रांति धारा बहती रहेगी,
जब तक भारत महान रहेगा।
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र













