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गीत-पावस-‌धरा का मिलन

घिर रहे घन श्याम नभ में, प्रीति का संदेश लें।
मंद-मंद समीर गाता, आज मधुमय वेश लें॥

पंथ में पायल बजाती, आ रही बरसात है।
भीगती स्मृतियों संग, प्रेम की सौगात है॥

दूर प्रिय के गाँव तक अब, मेघ-दूतक जा रहे।
बूँद बनकर नैन मेरे, व्याकुलता बरसा रहे॥

कुंज में कोयल पुकारे, नाम प्रियतम का सखे।
दामिनी नभ-पट सजाकर, प्रीत की पाती लिखे॥

रिमझिमों के बीच मन का, जागता अनुराग है।
हर दिशा में प्रेम-मदिरा, हर तरंग श्रृंगार है॥

भीगकर तन ही नहीं यह, प्राण भी सरसाए हैं।
पावसी इस राग में हम, और तुम बँध आए हैं॥

रात ने घूँघट गिराया, चाँद बादल में छिपा।
नेह की नव नाव लेकर, मन का राग छेड़ दिया॥

पूर्ण हो यह मिलन-पल अब, नेह का उल्लास है।
पावसों के संग प्रियतम, प्रेम का अभिसार है॥

पूर्णिमा सुमन
झारखंड धनबाद

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