
फ़िलॉसफ़ी की भी अपनी फ़िलॉसफ़ी होती है,सवालों की भी अपनी बंदगी होती है।जो उत्तरों के पीछे उम्र गुज़ार दें,उन्हें कहाँ पता—ख़ामोशी भी एक ज़िंदगी होती है।
चाँद ने कभी सूरज से रोशनी की भीख नहीं माँगी,अँधेरे को अपना साथी बनाया और मुस्कुराता रहा।जो अपनी पहचान ख़ुद गढ़ते हैं,उन्हें दुनिया का शोर कभी डिगा नहीं पाता।
सूरज अपनी तपिश पर चाहे जितना अभिमान करे,शाम होते ही उसे भी झुकना पड़ता है।समय की अदालत में कोई इतना बड़ा नहीं,जिसे अपने कर्मों का हिसाब न देना पड़ता है।
ख़ामोशी कभी कमज़ोरी नहीं होती,वह तूफ़ानों की जननी भी हो सकती है।और शब्द कभी ताक़त नहीं होते,यदि उनके पीछे सच्चाई न खड़ी हो।
जो ऊँचा दिखता है, वह महान हो—ज़रूरी नहीं,जो झुकता है, वह कमज़ोर हो—ज़रूरी नहीं।वृक्ष फल आने पर झुकते हैं,अहंकार केवल सूखी डालियों पर उगता है।
दुनिया चेहरों की किताब पढ़ती रही,मैं किरदार के अक्षर खोजता रहा।लोग मंज़िल का पता पूछते रहे,मैं सफ़र का अर्थ समझता रहा।
फ़िलॉसफ़ी किताबों में नहीं,जीए हुए हर सच में छिपी होती है।जो स्वयं को पढ़ ले,उसे किसी और ग्रंथ की ज़रूरत नहीं होती।
याद रखना—विचार जब चरित्र बन जाएँ,तभी दर्शन जन्म लेता है।और जब इंसान स्वयं से जीत जाए,तभी इतिहास उसे नाम से नहीं,उसके कर्मों से याद रखता है।— लॉस्टम
आर एस लॉस्टम













