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एक कविता

कविता की। दुकान

गांव, शहर,हर चोराहे पर हर तरफ पुस्तकालय लगवाऊं ।

हर पत्रिका में,हर किताब में, कविताएं छपवाऊं।।

ढेरों पुस्तकें हों, ढेरों पत्रिकाओं से कविताओं की दुकानें सजवाऊं।
शहर में चोराहों पर सुमन लायब्रेरी खुलवाऊं।।

वंदना,आरती,स्तूतियां और गीतों को दिन रात लिखूं मैं,
गा गाकर मैं देश भक्ति के गीतों को सुनाऊं।।

स्कूल के जर जर भवनों व्यवस्था को दिखलाऊं,
देवालय के दान चोरी से रुबरु कराऊं।
अस्पताल कि मरी प्रसुताओं की पीड़ाओं को दिखलाऊं,
नशा बेचने वाले लोगो की करतूतों को दर्शाऊं।।

स्कूल कम और शराब की दुकानें ज्यादा हो गई है बदला समय बतलाऊं।
उखड़े खुरंजे हों या रोती हुई सड़कें इनकी दुर्दशा दिखलाऊं।।

आशिक के साथ मंगेतर को मारा, या बेटी ने सुपारी दी मां को मरवाया,
कमी नहीं है शिक्षा की फिर भी मोत का तांडव को दर्शाऊं।।

अखबारों में राज दफ़न है, तस्कर, और गुनाहगार अछुतें, कानून का हाल बतियाऊं।
ड्रिंक पेय पदार्थ मिलावटी, जांच का खेल गज़ब है, अफसोस अफसर घुस में बीकतें,देश धर्म दिखलाऊं।।

बचपन लील गया मोबाइल, संस्कार ओझल हो चुकें हैं, परवरिश में सूना पन आ गया

कृष्ण की गीता सूनी है, रामायण की मर्यादा खो चुकी है,
कबीरा खड़ा सिसकता है अब, गुरु नानक संकोच कर रहे हैं
रिश्ता नाता दूर खड़ा हो चुका है,
प्रेम आज हवस बनता पल भर में, सुरक्षित नहीं बहिन बैटीयां, मां को पर पुरुषों में मन डोला है,
सब दुखी हैं अपने अपने घर में भी, विश्वास नहीं कहिं नजर नहीं आता है,,

मैं कविता में सबको बतलाऊं।।

अशोक सुमन भवानी मंडी (राज.)

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