
त्रेता में बाल बुद्धि लक्ष्मण जी से
परशुराम जी ने मुँह की खाई थी,
द्वापर में बालक श्रीकृष्ण जी ने,
कंस की महिमा तार तार की थी।
बररै बालकु एकु सुभाऊ,
इन्हहि न संत बिदूषहिं काऊ।
तेहिं नाहीं कछु काज बिगारा।
अपराधी मैं नाथ तुम्हारा।
बालकबुद्धि बैलबुद्धि नहीं होती है,
बालकबुद्धि ईश्वर स्वरूप होती है,
बाल स्वरूप में प्रभू स्वयं बसते हैं,
बालक तो नारायण स्वरूप होते हैं।
अक्सर बालक बड़ी सोच रखते हैं,
घर परिवार में उनकी बात सुनते हैं,
देश समाज के लिये आज बालक
कल के भविष्य का निर्माण करते हैं।
देश निर्माण का उत्तरदायित्व भी
देशवासी युवाओं- युवतियों को
आदित्य सारे विश्व में सौंपते हैं,
युवा का सम्मान देश में करते हैं।
डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ












