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सबके हिस्से मे हे अपने २ नसीब के आंसू

सबके हिस्से मे हे अपने २ नसीब के आंसू !
रुला देते हे हमे प्यार से करीब के आंसू !
अमीरो कि हंसी पर मेहरबान गरीब के आंसू !
हंसी हमसे रुठी जबसे भूख से बिलखते बच्चे पराजित होके सो गये !
संवेदनाऐ मर गई हमारी हम खुदगर्ज जानवर हो गये !
रोटी रास्ते मे पड़ा सिक्का नहीं जो हर कोई झुकके उठाले !
गिनती नहीं हाथ के छालो की मजदुर से पुछो उसने कितनी मुश्किल से अपने बच्चे पाले !
वो दिनभर चलाता फावड़ा ओर गेती डायन मंहगाई छिन लेती मुंह से निवाले !
हम केसे मानले ये किस्मत मे लिखा विधी का विधान हे !
उधर देखो सच कर्ज के बोज से दब मर रहा आज भी लघू किसान हे !
हंसना मना यहां मुफलिसो को अरे ये सुविधाभोगीयों का तमाशा हे अमीर दम्भ से बने बेठे भगवान हे !
सच कहूं तो दिलपे वार कर जायें पर क्या यही बुद्ध ‘ महावीर ‘ ईसा वाला वो अपना वंदे मातरम वाला हिन्दुस्तान हे।

सोनी जी

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