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कविता

जिस औरत के नजर में पति से बडकर पैसा है
वह औरत मेरी नजर में वैश्या है
जो औरत अपने पति परमेश्वर से ज्यादा महत्व धन को देती है
वह औरत उच्च कुल में जन्म लेकर भी गंदी नाली के कीड़े का अभिश्राप सह लेती है

जिसने सुहाग को बेचकर सोना खरीदा
उसने सात फेरों का अपमान किया
मंगलसूत्र का मोल जो नोटों में तौले
वो देवी नहीं, कुल की लाज को डुबोले

पति भूखा सोए, तिजोरी भरी रहे
ऐसी लक्ष्मी से तो घर नर्क बना रहे
जो सिंदूर की लाज छोड़ दौलत पर इतराए
वो जीवन भर कलंक का टीका लगाए

धन तो आता-जाता मेहमान है
पति ही सात जन्मों का भगवान है
जो संकट में भी साथ निभाता है
उसको छोड़ धन जो अपनाता है

वो नारी नहीं, सौदागर कहलाए
रिश्तों का व्यापार जो कर जाए
कुल की मर्यादा को जो ठुकराए
वो खुद ही अपना मान घटाए
ऐसी औरते भी वेश्या कहलाये
वो वेश्या ही कुल कलंकणी बन जाये
जो तनिक लालच में अपने चरीत्र पर दाग लगवाये

गोपाल जाटव ‘विद्रोही’ खड़ावदा तह गरोठ जिला मन्दसौर मध्यप्रदेश भारत देश

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