
मन के मंदिर में जब-जब
विश्वास का दीप जलता है,
ईश्वर तब पत्थरों में नहीं,
हर धड़कन में मिलता है।
श्रद्धा शब्द नहीं,
जीवन का सबसे सुंदर आधार है ,
जो हर अंधेरे में भी कहती है—
“अभी प्रकाश बाकी है।”
श्रद्धा..
वह शक्ति है,जो मीरा को विष में अमृत दिखा देती है,
जो शबरी के जूठे बेरों में प्रेम का स्वाद भर देती है,
जो सुदामा की झोली में कृष्ण का आलिंगन सजा देती है।
आँधियाँ लाख कोशिश करें,
पर उसे बुझा नहीं पातीं;
क्योंकि श्रद्धा का दीप
तेल से नहीं, समर्पण से जलता है।
आओ, ऐसा दीप जलाएँ
जो केवल पूजा तक सीमित न रहे,
बल्कि हर पीड़ित मन की आशा,
हर निराश हृदय की रोशनी बन जाए।
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र













