
जब कभी सरहद की राहों में,
मैं देश की खातिर बिखरने लगूँ,
और सासों की डोरी टूटने लगे,
तब तुम माँ भारती का आँचल बनकर आना,
और अपनी पावन गोदी में,
मुझे एक बच्चे की तरह समेट लेना।
जब तूफानों से टकराते हुए,
मेरी जान का ये दीया थकने लगे,
जैसे वतन की वेदी पर जलते दीये में,
तेल बहुत कम रह गया हो,
और उसकी लौ आखिरी बार फड़फड़ाने लगे,
तब तुम तिरंगे की मखमली छांव बनकर आना,
मेरी उस डूबती हुई साँस को,
शहादत का अमर अमरत्व दे जाना।
मगर याद रखना…
मुझे किसी उदासी या मातम से मत छूना,
मेरी विदाई पर आँखों में आंसू मत लाना,
तुम मुझे बस उस गौरव की तीली से जलाना,
जिसमें वतन की आज़ाद आब-ओ-हवा की नमी हो,
जो धीरे से छुए, तो चिता की आग भी चंदन हो जाए,
और मैं बिना किसी मलाल के,
इस देश की बलिवेदी पर ख़ामोशी से सुलग उठूँ।
इस मिटने और अमर होने की अमर कहानी में,
जब मेरी आँखें हमेशा के लिए मूँद जाएँ,
और मेरा नाम शहीदों की फेहरिस्त में शामिल हो जाए,
तब तुम मेरी राख को उठाना,
और इस प्यारे देश के खेतों और खलिहानों में,
एक पावन ख़ाक की तरह बिखरा जाना,
ताकि मैं फिर से इसी मिट्टी में जनम ले सकूँ।
रजनी कुमारी
लखनऊ उत्तर प्रदेश










