
कुंद इंदु सम देह हैं जिनकी कानों में कुंडल सोहे।
गले नाग मस्तक त्रिपुण्ड शुभ ,सबका मन शिवजी मोहे।
तन में भस्म लगाए बैठे ,भजते है नाम राम का।
कब दर्शन प्रभु आकर दोगे, सदा बाट गीता जोहे।।
पूर्ण करें प्रभु सबकी आशा ,भक्त द्वार पर आए हैं।
तरह तरह का गायन करके ,कातर दृष्टि गडा़ए हैं।
भोले भंडारी त्रिपुरारी, सब अपराध क्षमा करकेे,
विनय किए स्वीकार सभी की, सबको गले लगाए हैं।।
बादल लगते बावरे,दादुर करते शोर ।
धक -धक उर धड़के तभी ,विरहन का अति जोर।
प्रकृति सुन्दरी खिल उठी ,रिम झिम पड़ी फुहार,
विरह व्यथा विरहिन बढ़ी ,अश्रु नयन की कोर।।
कोख धन्य जगरानी माँ की ,धन्य बदरका धाम।
जन्म लिए आजाद जहाँ पर, किए जगत में नाम।
मातु भारती की आजादी ,हेतु दिये बलिदान,
अन्त समय तक किया बाँकुरा ,देश हितैषी काम।।
हाथ थाम लो भोले बाबा ,द्वारा तुम्हारे आई हूँ ।
मनहर सुन्दर सूरत तेरी ,अपने हृदय बसाई हूँ ।
हे गिरिजापति डमरू धारी,गंगाधर है अभयंकर ,
बने हुए जग में अविनाशी , तेरे ही गुण गाई हूंँ ।।
सूर्य पुत्र अरु पवन तनय की, महिमा जग में भारी है।
दोनो ही जन परम प्रतापी, कलयुग मानें हारी हैं।
जों भी इनका ध्यान करे ,विपदा उसकी मिट जाती,
न्याय सिद्धि के परम देवता ,दुष्टो के संघारी हैं।।
डॉ गीता पांडेय अपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश












