
कहते हैं कि दिवारों के कान होते हैं,
तो हम दिवारों से बातें करके सो लेंगे,
तकिया लगा कर सिरहाने रात गुजार लेंगे ,
आंखों को बंद करके करवटों में हो लेंगे,
परदेश में बसे हो जैसे आते ही नहीं हो,
बेवफा हम तेरी तस्वीर से बातें करके रो लेंगे,
तु हों कहिं भी आबाद रहे मेरे हमदम
सनम बेवफा तेरी बला हमारे दामन ढो लेंगे ,
तेरी राहों से कांटों को अपने हाथों से हटाएंगे ,
चुभा कांटा तो लहू आंख के गंगा जल से धो लेंगे,
अपनी पलकों से आंसू न गिरने देंगे,
तेरी जिंदगी से वास्ता तोड़ कर दूर हो लेंगे।।
अशोक सुमन भवानी मंडी (राज.)













