
विधा : पद्य
प्रेम प्यार के आस का ,
धागा यह विश्वास का ,
भाई बहनों का संबंध ,
निर्मल सा एहसास का ।
न निराश न उदास का ,
न लोभ लालच त्रास का ,
रक्षाबंधन के प्यास का ,
यह धागा है सुवास का ।
पावन धागा राखी का ,
मानवता रूपी साखी का ,
रिश्ते में न चले रिश्वत ,
ये धागा नहीं बैशाखी का ।
विश्वस्त धागा है रक्षासूत ,
रक्षाबंधन का मंगल सूत ,
तू विश्वस्त धागे का रक्षक ,
स्वसा भ्रात मातृ पितृ पूत ।
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।













