
श्रावण की पूर्णिमा आई, लेकर खुशियाँ अपार,
बहना की आँखों में चमका, भाई का सच्चा प्यार।
कलाई पर जब राखी सजती, खिल उठता मन-आँगन,
रेशम का यह धागा बनता, प्रेम भरा मधुर बंधन।
धागा छोटा, भाव बड़े हैं, इसमें प्यार समाया,
बहना ने विश्वास बाँधकर, मन का दीप जलाया।
सदियों से यह रीत चली है, पावन इसकी बात,
रक्षा-सूत्र जोड़ता आया, दिल से दिल के साथ।
इंद्राणी ने इंद्र की कलाई में, रक्षा-सूत्र सजाया,
संकट के उस कठिन समय में, साहस मन में आया।
डर मिटा और विश्वास जगा, खुली विजय की राह,
तभी से यह रक्षा-सूत्र बना, शुभता की सच्ची चाह।
कृष्ण-द्रौपदी की कथा सुनाती, स्नेह भरी वह बात,
छोटा-सा वह प्रेम का धागा, बन गया जीवन-साथ।
रिश्ता केवल खून का रिश्ता, इतना ही नहीं होता,
सुख-दुःख में जो साथ निभाए, वही अपना होता।
जब बहना राखी बाँधती, आँखों में होता विश्वास,
भाई के सुखमय जीवन की, करती मन से आस।
भाई कहता—“बहना मेरी, तू यूँ ही नित मुस्काना,
तेरे हर सुख-दुःख में मुझको, अपना साथ निभाना।”
रक्षा केवल तन की नहीं, मन की भी हो रक्षा,
प्यार, भरोसे और सम्मान से, रिश्तों की हो सुरक्षा।
दूरी चाहे कितनी बढ़ जाए, मन की डोर न टूटे,
समय बदल जाए चाहे, अपना प्यार कभी न छूटे।
राखी केवल धागा नहीं है, रिश्तों का उपहार,
इसमें बचपन की मीठी यादें, इसमें सच्चा प्यार।
जब तक बहना राखी बाँधे, महके हर परिवार,
तब तक दुनिया में बना रहे, प्रेम और विश्वास अपार।
रेशम का यह अमर धागा, कहता है एक ही बात,
प्रेम जहाँ सच्चा होता है, मिलती खुशियों की सौगात।
रक्षाबंधन केवल पर्व नहीं, है यह मन का विश्वास,
भाई-बहन का प्रेम रहे यूँ, जैसे फूलों का सुवास।
योगेश गहतोड़ी “यश”













