
साथ खेलना और झगड़ना,
चिढ़ना और चिढ़ाना!
पकड़े जाने पर, खुद भी,
बचना और बचाना!!
कभी रूठना कभी मानना,
हंसना और हंसाना!
लुका-छिपी कभी खेलना,
फिर पढ़ना और पढ़ाना!!
बीत गए दिन वो बचपन के,
याद बहुत हैं आते!
न जाने क्यों आज भी वो,
है हमें बहुत तड़पाते!!
कभी दिवाली, होली तो,
है कभी दशहरा आए!
रक्षाबंधन का क्या कहना,
‘जिज्ञासु’ हिय हुलसाए!!
कमलेश विष्णु सिंह ‘जिज्ञासु’













