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संस्कृति की कलाई

अरे भाई!
बड़ी आफ़त आ गई,
देश की संस्कृति
डगमगा गई!

क्योंकि किसी की बहन ने
राखी बाँध दी—
और भाई की कलाई नहीं,
एक और कलाई पकड़ ली!

बस फिर क्या था—
संस्कृति मंत्रालय के
स्वयंभू सचिवों ने
मोर्चा खोल दिया—

“रुको! रुको!
यह कैसी राखी है?
यह तो हमारे संस्कारों की
नाक पर रखी आरी है!”

किसी ने कहा—
“राखी की दिशा गलत है!”
दूसरा बोला—
“दिशा छोड़ो,
पहले कपड़े देखो!”

बस फिर
राखी पीछे रह गई,
कपड़े आगे आ गए,
और भारतीय संस्कृति के
सारे ठेकेदार
अचानक दर्जी बन गए!

“यह भारतीय पहनावा नहीं है!”
अरे जनाब!
आप भारतीयता के
कस्टम विभाग में कब भर्ती हुए?

किस पोशाक पर
‘मेड इन इंडिया’ की मुहर लगे
और किस पर
‘संस्कृति विरोधी’ का स्टिकर—
यह फैसला
आपकी अलमारी करेगी
या संविधान?

मगर साहब,
तर्क से उनका पुराना बैर है।
उन्होंने कहा—
“हमारी बेटियाँ ऐसे कपड़े नहीं पहनतीं!”

हमने पूछा—
“कौन-सी बेटियाँ?”
बनारस वाली?
नागालैंड वाली?
मणिपुर वाली?
केरल वाली?
राजस्थान वाली?

भारत तो साहब
कपड़ों का भी लोकतंत्र है!
यहाँ साड़ी है,
धोती है,
पगड़ी है,
फेरन है,
मेखला है,
फनैक है,
लुंगी है,
कुर्ता है—

और आपकी संस्कृति
बेचारी
एक ही हैंगर पर टँगी है!

मर्द ने जींस पहनी—
“मॉडर्न!”
मर्द ने सूट पहना—
“प्रोफेशनल!”
मर्द ने फटी जींस पहनी—
“यंग फैशन!”

औरत ने अपनी पसंद पहनी—
“संस्कृति खतरे में!”
वाह!
आपकी संस्कृति
बड़ी अद्भुत मशीन है—
पुरुष को देखकर
फैशन बनाती है,
स्त्री को देखकर
फैसला सुनाती है!

फिर राखी पर लौटिए—
बहन ने बाँधी
तो प्रेम!
भाई ने बाँधी
तो प्रचार!

बहन ने बहन को बाँधी
तो परंपरा पर प्रहार!
अरे भाई,
राखी धागा है,
आपकी जागीर का
रजिस्ट्रेशन पेपर नहीं!

रिश्ता है,
किसी खानदानी
“रक्षा-लाइसेंस” का दस्तावेज़ नहीं!

पर नहीं!
पितृसत्ता की अदालत में
हर चीज़ का मुकदमा चलता है—

पहले कपड़ों पर बहस होगी,
फिर चरित्र पर शक होगा,
फिर संस्कृति रोएगी,
फिर राष्ट्र खतरे में आएगा—

और अंत में
दो सज्जन घोषणा करेंगे—

“हम स्त्रियों का बहुत सम्मान करते हैं!”
हाँ साहब!
इतना सम्मान करते हैं
कि उन्हें देवी बना देते हैं—

बस इंसान बनने की
इजाज़त नहीं देते!
देवी बनो—
तो आरती होगी।

माँ बनो—
तो महिमा होगी।
बहन बनो—
तो रक्षा होगी।

पत्नी बनो—
तो मर्यादा होगी।
लेकिन अगर कहो—
“मैं अपनी इच्छा से कपड़े पहनूँगी,
अपनी पसंद से राखी बाँधूँगी,
अपनी सुरक्षा का निर्णय भी
स्वयं करूँगी!”

तो अचानक—
संस्कृति की छाती में दर्द!
परंपरा को बुखार!
संस्कार आईसीयू में!

डॉक्टर दौड़े आए—
“क्या हुआ?”
ठेकेदार बोला—
“डॉक्टर साहब!
एक लड़की ने
अपनी मर्ज़ी से
कुछ पहन लिया है!”

डॉक्टर ने पूछा—
“और?”
“और…
राखी भी
आपकी बताई दिशा में नहीं बाँधी!”

डॉक्टर ने माथा पीट लिया—
“फिर तो मामला गंभीर है,
पहले संविधान हटाइए,
परंपरा की एक्स-रे कराइए!”

सच तो यह है,
जनाब—
आपको कपड़ों से परेशानी नहीं,
कपड़े चुनने की आज़ादी से है।

आपको राखी से परेशानी नहीं,
रक्षा की भूमिका में बराबरी से है।

आपको संस्कृति से प्रेम कम,
उसकी चौकीदारी का अधिकार ज़्यादा है।

और संस्कृति?
वह कोने में बैठी
धीरे-धीरे हँस रही है।

कह रही है—
“मुझे बचाने का इतना शौक है
तो पहले मुझे
अपनी अलमारी से बाहर निकालो!”

क्योंकि मैं
किसी एक कपड़े में नहीं रहती,
किसी एक कलाई में नहीं बँधती,
किसी एक पुरुष के आदेश से
परिभाषित नहीं होती।

मैं बदलती हूँ,
चलती हूँ,
सीखती हूँ,
जीती हूँ!

और हाँ—
जिस दिन
तुम्हारी बेटी, बहन, पत्नी या माँ
अपने मन का पहनावा पहनकर
अपनी इच्छा से राखी बाँधेगी,

उस दिन संस्कृति नहीं मरेगी—
बस तुम्हारी पितृसत्ता की
कलई खुल जाएगी!

शशि धर कुमार, कटिहार, बिहार

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