
रक्षा-बन्धन पर्व अनोखा,
आज देश में फिर आया,
इसके जैसा और कोई क्या?
देखो, यह जग में छाया।
सरिता-सी कल-कल ध्वनि,
करता, मीठी तान सुनाता है,
जैसे सरद ऋतु में पपीहा,
जल पीकर इठलाता है।।
शान्ति, प्रेम, आनन्द, नेह भर,
यह सबको हरषाता है,
सूरज-चन्दा इस पर वारे,
इस सा क्या कहीं नाता है?
इसके आगे सभी प्रणत् हैं,
झुककर करते इसे सलाम,
हिन्द देश की थाती अनुपम,
सदियों से लहराये नाम।।
ऋषि-मुनि, योगी चरण पखारें,
करते इसका गायन रोज,
वासुदेव ने महिमा जानी,
दिया एक दिन निज घर भोज।
नारद ने महिमा जानी थी,
और इन्द्र ने मान इसे,
लक्ष्मी पहुँची बलि ढ़िंग, राखी,
बाँध, माँगती पति उनसे।।
कलयुग में अकबर से माँगी,
भाई बनाकर मदद जभी,
कीन्ही तब सहायता उसने,
बहिना की, दे बचन तभी।।
रचनाकार-
जुगल किशोर त्रिपाठी (साहित्यकार)
बम्हौरी, मऊरानीपुर, झाँसी (उ०प्र०)











