
नहीं केवल कलाई पर बंधा, येप्रेम का धागा है,
इसमें तप की शक्ति बसी संयम का अनुरागा है।
जहाँ धर्म संकट में हो और
श्रमण संस्कृति पर उपसर्ग,
वहाँ रक्षा कर स्वयं धर्म बचानेवाला बड़भागा है।
वन की नीरवता में जब, तप की धुन बजती थी,
मौन अधरों पर आत्मा की, निर्मल ज्योति सजती थी,
अकंपनाचार्य सहित सात सौ मुनि, ध्यानमग्न थे ऐसे,
ज्यों नभ की निस्तब्ध गोद में, ध्रुव-दीपक जलती थी।
न तन का मोह, न क्षुधा-पिपासा, न जग का आकर्षण,
आत्मतत्त्व की ओर निरंतर, बढ़ता था अंतर्मन।
देह दमकती स्वर्ण आभ सी, और चेतना थी निर्मल,
त्याग स्वयं आभूषण था, तप ही था उनका जीवन।
किन्तु दर्पित सत्ता ने, उपसर्गों के बाण चलाए,
शांत तपोवन के प्रांगण में, हिंसा के बादल छाए।
मुनि अडिग रहे—ज्यों गिरिराज, प्रचंड पवन में भी,
क्षमा-कवच ओढ़े बैठे थे, भीतर समता दीप जलाए।
देख मुनियों की यह पीड़ा, करुणा का सागर हिल गया,
विष्णुकुमार मुनि के अंतस का, ऋद्धि तेज फिर खिल गया।
धर्म पुकार रहा था जैसे, श्रमणों का उपसर्ग दूर हो
तप ने स्वयं संकल्प लिया और अन्याय निष्फल गया।
न शस्त्र उठाया न रक्त बहा, न रण का विन्यास हुआ,
तप के तेज से दंभित मस्तक स्वयं परास्त हुआ।
वामन रूप में आए मुनि, पर तेज विराट हुआ,
तीन पगों में अहंकार का सारा विस्तार ह्रास हुआ।
एक चरण में मानुषोत्तर पर्वत, दूजे में सुमेरू झुक आया,
देख तपस्या का वह वैभव, बलि का दर्प सकुचाया।
जिस शक्ति को समझा था उसने केवल दुर्बलता,
उसी संयम ने अधर्म के सम्मुख सत्य का ध्वज लहराया।
जैन श्रमण ने बतलाया संयम दुर्बलता का नाम नहीं,
क्षमा कभी कायरता नहीं, मौन कोई विराम नहीं।
जिसके भीतर आत्मबल हो, वह जग जीत सकता है,
श्रमण सेवा से बढ़कर कोई धर्मरक्षा का धाम नहीं।
रक्षाबंधन की डोर तभी पावन कहलाती है,
जब उसमें स्नेह संग कर्तव्य की गाँठ बंध जाती है।
वह कच्चा-सा सूत हमें यह स्मरण कराता है,
धर्म संकट में हो तो चेतना स्वयं प्रहरी बन जाती है।
श्रमण परम्परा के माध्यम से तप की लौ बचती है,
उनकी साधना से मानवता की अंतर-ज्योति सजती है।
एक तपस्वी की रक्षा में कितनी संस्कृतियाँ जीवित हैं,
उनके चरणों की धूलि में कितनी पीढ़ियाँ पवित्र हैं।
आओ इस रक्षाबंधन पर ऐसी राखी बाँधें हम,
केवल कलाइयों पर नहीं, अंतर में संकल्प साधें हम।
सत्य, अहिंसा, संयम, तप—इनकी मर्यादा रखकर,
धर्मदीप की लौ को अपने जीवन में आराधें हम।
जहाँ कहीं भी तप पर संकट हो, हम ढाल बनें,
जहाँ अहिंसा रोती हो, उसके लिए मशाल बनें।
विष्णुकुमार की गाथा केवल सुनने की कथा नहीं,
हममें भी धर्म बचाने का साहस हो, ऐसी मिसाल बनें।
नहीं चाहिए शस्त्र हमें, न हिंसा का अभिमान,
क्षमा, अहिंसा, संयम ही जैन धर्म की पहचान।
विष्णुकुमार की कथा आज भी यही सिखाती है—
धर्म बचाने वाला ही होता है सच्चा बलवान।
नहीं चाहिए वैर हमें, न विजय का मद चाहिए,
धर्मपथ पर चलने का बस निर्मल हृदय चाहिए।
रक्षा का यह पर्व तभी सार्थक होगा जग में,
श्रमण संस्कृति की रक्षा को जाग्रत अंतर्मन चाहिए।
राखी का धागा कहता है, बंधन इतना ही न हो,
स्नेह रहे, पर धर्म से बढ़कर कोई संबंध न हो।
मुनियों की तप-ज्योति अक्षय रहे, यही मंगल हो,
मानवता बचे, अहिंसा बचे, और आत्मधर्म मंद न हो।
कलाई पर बंधी राखी यदि धर्म रक्षा से जुड़ पाए,
सूत का छोटा-सा तंतु भी सुदृढ़ संकल्प बन जाए।
विष्णुकुमार की तप-गाथा युगों युगों से कहती है
जो धर्म की रक्षा करे, वो जीवन धन्य कहलाए !
विरेन्द्र जैन “माहिर”
नागपुर महाराष्ट्र











