
आईना भी झूठा है,
वो भी झूठी बातें करता है,
चेहरे की हक़ीक़त दिखाकर
दिल की सच्चाई से पर्दा करता है।
वो तो तक़दीर है
जो मुझे आईना दिखाती है,
कौन अपना था, कौन पराया
हर राज़ धीरे-धीरे बताती है।
आईना तो बस चेहरा दिखाता है,
तक़दीर किरदार दिखाती है,
आईना उम्र का सच कहता है,
तक़दीर ज़िंदगी का हिसाब सुनाती है।
कभी चेहरे पर मुस्कान होती है,
मगर आँखों में दर्द छुपा होता है,
आईना उस दर्द को कहाँ समझता है
ये तो वक़्त है
जो हर ज़ख़्म का पता बताता है।
इसलिए अब आईने से क्या पूछूँ,
जब जवाब तक़दीर के पास है,
चेहरा चाहे जितना खूबसूरत हो,
इंसान वही है
जिसके भीतर इंसानियत का एहसास है।
आर एस लॉस्टम











