Uncategorized
Trending

मोल नहीं जिनका अंजुलि भर था

कितने घातों प्रतिघातों से गुजरा,
पर विह्वहल कातर ना कभी हुआ,
मुग़लों अंग्रेजों से बाज भेड़िये आये,
खूनी खेल खेल कर भारत लूटा।

कम्पित अधर, अस्मिता लूटी,
अश्रु धार दृग, जीर्ण श्वास थी,
मृत्यु कराहती, असहाय हुई थी,
बाँटो राज करो, अकथ कहानी थी।

रणभेरी जब बजने वाली थी,
मोल न उनका कोई रह पाया,
लूट – पाट कर भागे भारत से,
भारत ने तब आज़ादी पाया।

चार बाँस चौबीस गज
अंगुल अष्ट प्रमाण,
ता ऊपर सुल्तान है,
मत चूके चौहान।

चंदबरदाई, श्यामनारायण पांडे,
सुभद्रा कुमारी चौहान, कविश्रेष्ठ,
जागरूक सब जन जन को करते,
पर सब चढ़ते थे जयचंदों की भेंट।

मोल नहीं जिनका अंजुलि भर था,
सदियों सदियों तक राज कर गये,
आदित्य एकता हुई जब भारत में,
आतताई सब भाग कर चले गये।

डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *