
मेरी भाषा मेरी पहचान
मेरी भाषा मेरा अभिमान
मेरी बोली मेरी वाणी,
मेरी सदियों पुरानी कहानी।
अक्षरों में बसा जीवन मेरा,
शब्दों में झलकती रुहानी।
भाषा ही तो मेरी पहचान है,
मेरी संस्कृति का अभिमान है।
मां की गोदी की लोरी में,
दादी की मीठी कहानी में।
जिस स्वर ने मुझे बोलना सिखाया ,
पहला स्पंदन जीवन में लाया।
वही शब्द मेरा विश्वास है ,
मेरे अस्तित्व का सांस है।
विचारों को पंख लगाती,
दिल के भावों को सहलाती।
दुःख सुख की बने अभिव्यक्ति,
देती अंतरमन को शांति – शक्ति।
बिना भाषा के सब सुना सुना,
यह हर रिश्ते का धागा अनूना ।
माटी की सोंधी खुशबू इसमें,
पुरखों का अनुभव समाया इसमें ।
हर एक शब्द में मर्यादा है,
जिसने मुझे इंसान बनाया।
अपनी भाषा पर गर्व मुझे,
हर पल मनाऊं इसका पर्व मुझे।
रचनाकार, प्राचार्य, लेखक
डॉ. प्रदीप कुमार











