
बैठे पास तेरे चरणों में,
अंतर की प्यास बुझाऊँ!
कृत कर्मों को सौंप तुझे माँ,
प्रज्ञा का मैं दीप जलाऊँ!
जग में जीना है जितने दिन,
नए नए नित गीत बनाऊँ!!
राह बताना है तुमको ही,
कैसे पास तुम्हारे आऊँ!
बैठ पास तेरे चरणों में,
अंतर मन की प्यास बुझाउँ!!
करना था क्या कर न सका मैं,
उलझा रहा समझ न पाया!
लोभ मोह मद के चक्कर में,
जीवन को क्यों व्यर्थ गँवाया!!
शेष बचा अब जीवन है जो,
उसको कैसे सफल बनाऊँ!
बैठ पास तेरे चरणों में,
अंतर मन की प्यास बुझाऊँ!!
राह दिखा दो ऐसा हे माँ,
काम सदा सबके मैं आऊँ!
संकट में भी अविचल रहकर,
मैं अपना कर्तव्य निभाऊँ!!
अकुलाहट ‘जिज्ञासु’ मन की,
माँ कैसे मैं शांत कराऊँ!
बैठ पास तेरी चरणों में,
अंतर मन की प्यास बुझाऊँ!!
कमलेश विष्णु सिंह ‘जिज्ञासु’











