
वो मुरली में उनका ध्यान है,
गीता में दिया हमको ज्ञान है।
वो कुरुक्षेत्र में करते कर्म है,
वो हर दिल में बसे प्राण है।।
कभी कभी वो रास रचाए,
कभी कहीं पर चक्र उठाए।
मन्नू प्रेम में कोमल है इतने,
वो युद्ध में काल बन जाए।।
उसने हमें नित सिखाया है –
फल की चिंता करना छोड़ दे।
कर्म ही तेरा सच्चा धर्म है,
बस कर्म में मन को मोड़ दे।।
सबको ध्यान सिखाता है वो,
जब वो बंसी धुन बजाता है।
अक्सर आँख बंद हो जाती है,
यह दिल उसी में खो जाता है।।
कर्म सिखाता है कन्हैया,
जब रथ स्वयं चलाता है।
स्वयं भगवान होकर भी,
वो यूं सारथी बन जाता है।।
स्वरचित, मौलिक, अप्रकाशित है।
मुन्ना राम मेघवाल।
कोलिया,डीडवाना, राजस्थान।











