
विषय : बरसात
विधा : पद्य
झीमी झीमी बरसात हो रही है ,
दिन में देख लो रात हो रही है ,
अबतक था जो अच्छा मौसम ,
बदलाव अब अकस्मात हो रही है ।
गिर रहीं बूॅंदें इस अंबर के तले ,
छतरी लगा हम दोनों प्राणी चले ,
बरसातें देखते हम हो गए बूढ़े ,
इसी अंबर तले तो हम बढ़े पले ।
ईश की महिमा बड़े नेक भले ,
खुशदिल बरसात बरसाए पानी ,
चले ले एक दूसरे का ये सहारा ,
हम पति पत्नी हमदम प्राणी ।
रिमझिम रिमझिम बरसा पानी ,
धीमी कदमें बढाए हम प्राणी ,
रिमझिम बरसा व धीमी कदमें ,
हमदम लिपटे कदम ताल ज्ञानी ।
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।











