
महफ़िल में बात मेरी चल रही थी,
गुरु ने आकर हाथ थाम लिया था।
मैं भीड़ में कहीं भटक गया था,
गुरु ने ही राह दिखा दिया था।
अपने ही खिलाफ खड़े थे सभी,
गुरु ने लड़ना मुझे सिखा दिया था।
मैं टूट कर चुप हो गया था,
गुरु ने फिर से बोलना सिखा दिया था।
दिल में रखे वही दूर हुए थे,
गुरु ने अपना पराया बताया था।
हंसी के पीछे वार हुए थे,
गुरु ने ही जीना सिखा दिया था।
सब कुछ गुरु पर छोड़ दिया था,
हर सवाल गुरु से जोड़ दिया था।
अंधेरी महफ़िल बदल दी उन्होंने,
रौशनी से दिल भर दिया था।
गुरु ने कहा भीड़ से अलग चल,
सच की राह पर अडिग चल।
गिरेगा तो मैं थाम लूंगा,
बस तू अपना कर्म कर चल।
आज जो भी हूँ गुरु से ही हूँ,
उन्हीं के शब्दों में बसा हूँ।
कल जो भटका कहते थे मुझे,
आज बोले लम्बी उम्र है तुम्हारी।
अब महफ़िल में गुरु का नाम है,
हर बात में गुरु का काम है।
जो कल खिलाफ थे वही कहें,
जय गुरुवर, लम्बी उम्र है तुम्हारी।
अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला अमन सनातनी
सावनेर नागपुर महाराष्ट्र











